दिल से.............

रविवार, 27 जून 2010

दोहरी मानसिकता के शिकार हिंदी फिल्म समीक्षक और दर्शक



मैं कोई लेखक नहीं, कोई आलेखक भी नहीं, लेकिन हाँ अपनी बातों को यथासंभव (एक हद तक) रखने में यकीन रखता हूँ। मेरे पास सोचने-समझने की जो थोड़ी-सी शक्ति है, उसी की चहारदीवारी में विचारों की गुत्थम-गुत्थी, उठापटक चलती रहती है। दिन भर हर तरह के विचार दिमाग के कारखाने में कच्चे माल की तरह आते रहते हैं, लेकिन अमूमन यह कारखाना खराब हीं रहता है और इसलिए कभी-कभार हीं मैं किसी खास निष्कर्ष पर पहुँच पाता हूँ। फिर भी यह क्रम चलता रहता है क्योंकि मेरे हिसाब से अगर कोई कोशिश हीं न की जाए तो सफ़लता कहाँ से मिलेगी! सफलता हासिल करनी हो तो कारखाने के कल-पुर्जों को घिसना तो पड़ेगा हीं। घिसते-घिसते कोई एक पुर्जा तो होगा हीं जो हमारा काम कर जाएगा। वैसे भी कहते हैं कि दस बटेरों पर पत्थर चलाया जाए तो एक बटेर को तो हाथ आना हीं है। और जब कोई एक बटेर या कोई एक बात खुलकर सामने आ जाती है यानि कि जब मैं किसी मुद्दे पर पक्का हो जाता हूँ तो लगता है कि मैंने मैदान मार लिया हो, लगता है कि इसे औरों से भी बाँटा जाए। औरों को भी खबर की जाए कि आज मेरे पास क्या है। (मेरे पास माँ है...... के अंदाज में हीं) । सभी जानते हैं कि आज की दुनिया कितनी गतिशील, कितनी तेज-तर्रार है। इस आज की दुनिया में, अपने विचार रखने, अपनी सोच औरों से बाँटने के हज़ार तरीके हैं और इन हज़ार तरीकों में एक तरीका है आलेख लिखना। अब आप सोच रहे होंगे कि जहाँ मैंने शुरू में कहा कि "मैं कोई आलेखक नहीं", वहीं अभी "आलेख लिखने" की बात कर रहा हूँ। "आलेखक नहीं"- यह सच है, और इसलिए हो सकता है कि मैं इस आलेख के माध्यम से जो भी कुछ कहने जा रहा हूँ, उसमें सफल ना होऊँ (जिस तरह हज़ार चीजों पर माथा-पच्ची करने के बाद एकाध चीज हीं मेरे पल्ले पड़ती है, उसी तरह हज़ार शब्द उगल देने के बाद हो सकता है कि मेरा एकाध शब्द हीं मतलब का हो या फिर एक शब्द भी पल्ले पड़ने लायक न हो) , लेकिन यह तो मानना हीं पड़ेगा कि किसी से बिना मिले अपनी बात सब के बीच रखने का इससे अच्छा कोई तरीका नहीं। इसलिए दूसरा उपाय न पाकर डरते-डरते मैं "हिन्द-युग्म" के इस मंच "बैठक" पर आया हूँ।

कहने को मेरे पास बहुत सारी बातें हैं। औरों की तरह फिल्मों से गहरा लगाव हैं, इसलिए पहली बार तो यही सोचा कि क्यों ना फिल्मों पर हीं कुछ लिख लूँ। वैसे भी लोगों की समीक्षाएँ (मेरे एक मित्र के अनुसार फिल्मों के समीक्षक अब समीक्षक नहीं रहे, ये आलोचक हो गए हैं..... और आलोचक भी ऐसे आलोचक नहीं जो गुणों और अवगुणों पर बराबर की नज़र रखते हों, बल्कि ऐसे आलोचक जो बस आलोचना करना हीं जानते हैं यानि कि मौका मिला नहीं कि बुराईयों का पुलिंदा लेकर बैठ गए) पढ-पढकर मेरे मन में भी यह इच्छा घर कर गई थी कि मैं क्या किसी से कम हूँ... मैं भी फिल्मों पर अपना ज्ञान झाड़ सकता हूँ। जब लोग बिलावज़ह किसी फिल्म (पढें: रावण) की अंतड़ियाँ तक निकालने पर तुले हैं तो किसी भले मानुष की तरह क्या यह मेरा फ़र्ज़ नहीं बनता कि मैं इन कसाईयों के "हक़" पर प्रश्न-चिह्न खड़ा करूँ। खुद तो आज तक एक सीन (दृश्य) तक सही से उकेर नहीं पाए (सपने में भी) और दूसरों की मेहनत पर भर-भर के कीचड़ उछालते हैं। नाम न लूँगा लेकिन आप इस वाक्ये से समझ जाएँगे.... हमारे यहाँ के एक बहुत बड़े फिल्म-आलोचक हैं जिनकी मक़बूलियत बस इसी कारण से है कि उन्होंने "फ़िज़ा" बनाई थी। अब "फ़िज़ा" का क्या हश्र हुआ था और उन्हीं के भाई-बंधुऒं (दूसरे फिल्म-आलोचकों) ने इसे कितने "स्टार" दिए थे, ये तो जग-जाहिर है.... फिर उन्हीं महोदय ने जब "काईट्स" की समीक्षा की तो "ऋत्विक" की खूब टाँग खींची और 
"राजनीति" को तो "राज-नट्टी" हीं कह दिया... यहाँ तक कि उन्होंने "मनोज वाजपेयी" को भी नहीं छोड़ा... कहा कि काठ-जैसी सूरत बनाए घूम रहे थे वे पूरी फिल्म में। अब कोई उनसे पूछे कि उनकी "फिज़ा" में भी तो यही दो कलाकार थे। उस समय उन्होंने इन दोनों से क्या अलग, क्या जुदा करवाया था। और अगर कुछ अलग नहीं करवा पाए थे तो "अनुराग बसु" और "प्रकाश झा" को वो क्या दूसरी दुनिया के निर्देशक समझते हैं जो वो कोई "जादू" कर देंगे। ऐसे "दोहरी सोच" वाले लोग जब तक "समीक्षा" करते रहेंगे, तब तक हमारी फिल्मों का भला नहीं हो सकता।

माफ़ कीजिएगा .... मैं भावनाओं में बह गया और ना-ना कहते-कहते बहुत कुछ कह गया। हाँ, तो इसी तरह करने को कई सारी बातें हैं। अभी-अभी मैंने "दोहरी सोच" के बारे में कुछ कहा..... तो यह "दोहरी सोच" "दोहरी मानसिकता" बस फिल्म-समीक्षकों तक हीं सीमित नहीं है, हम दर्शकों के बीच भी इसने अपना मकाम हासिल किया हुआ है। इसका सबसे बढिया उदाहरण है "हिन्दी फिल्मों" में किसी दृश्य या किसी खास तरह की अदायगी (या अदाकारों) को नकारने वाले लोगों में "अंग्रेजी फिल्मों" के उन्हीं दृश्यों या अदायगी को पूजने की प्रथा। यह बीमारी तो आजकल हर "सुसभ्य" शहरी इंसान में देखी जा सकती है। हिन्दी फिल्म में अगर किसी ने कहा कि "मैं मैं हूँ" तो लगे नाक-भौं सिकोड़ने, लगे उसकी बघ्घियाँ उधेड़ने लेकिन अगर किसी अंग्रेजी फिल्म में (जो कि उन "सुसभ्य" लोगों को भी पहली मर्तबा समझ में नहीं आती .... मसलन मैट्रिक्स, प्राईमर) किसी बड़े-से "सुसभ्य" कलाकार (मान लीजिए "अल पचीनो") ने चिघ्घार कर कहा "
दिस ईज द वे आई ऐम" तो वही नाक-भौं सिकोड़ने वाले लोग सारे शर्मो-हया भूलकर तालियों की गड़गड़ाहट में डूब जाते हैं.... उस समय किसी को भी यह ध्यान नहीं आता कि भाई "इसमें नया क्या है"....क्या यह इंसान तीस-मार खान है कि इसने उसी "बेकार"-से संवाद को "बेजोर" बना दिया है... मुझे तो नहीं लगता..... फिर ऐसा क्यों है कि "हिन्दी-फिल्म" मे जो चीज उन "सुसभ्य" लोगों को "ओवर-एक्टिंग" लगती है, जो सिचुएशन्स, जो प्रस्तुतिकरण उन्हें "ढपोल-शंख" लगते हैं, वही सारी चीजें "अंग्रेजी फिल्मो" में जाकर "ग्रेट एक्टिंग" और "मारवेलस थिंकिंग" बन जाती हैं। भला कितने लोग हैं यहाँ जिन्होंने "नो स्मोकिंग" देखी है... मेरे हिसाब से बहुत कम हीं लग होंगे। "नो स्मोकिंग" कैसी फिल्म थी... अच्छी या बुरी.... यहाँ यह सवाल नहीं है, सवाल यह है कि अगर आपने इसी तरह कि प्रयोगधर्मी कोई अंग्रेजी फिल्म (मसलन "टेरेन्टिनो" की "पल्प फिक्शन") पसंद की है तो आपको "नो स्मोकिंग" भी पसंद आनी चाहिए थी। पसंद आना तो बाद की बात है.... आपको इस फिल्म को एक "ट्राई" तो जरूर हीं देना था। अगर आपने ऐसा नहीं किया है तो आप मेरी बातों को "प्रूव" कर रहे हैं कि "दोहरी मानसिकता" हम सब के अंदर है...... है ना? इतना कुछ पढकर आप सोचने लगे होंगे कि मैं अंग्रेजी फिल्मों से खुन्नस खाए बैठा हूँ, इसलिए मौका मिलते हीं मैंने सारा भंड़ास निकाल दिया... तो मैं बताए देता हूँ कि "अंग्रेजी फिल्मों" से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है...... ना हीं कोई खुन्नस है, हाँ "भंड़ास" जरूर है, लेकिन वो फिल्मों के लिए नहीं है, बल्कि हमारी "तथाकथित" "प्रगति" और "शहरीपन" के लिए है....... फिल्में तो बस एक बहाना है (मुझे समाज का सच दिखाना है....... हा हा)

जब फिल्मों की हीं बात चल निकली है तो ज्यादा दूर क्या जाना....... अंग्रेजी फिल्में तो "हिन्दुस्तान" में आयात (इम्पोर्ट) होकर आती हैं..... लेकिन जो फिल्में हिन्दुस्तान में हीं बनती हैं, उनसे भी तो बिना कारण भेदभाव बरता जाता है। जी हाँ मैं "क्षेत्रीय" फिल्मों की बात कर रहा हूँ। "क्षेत्रीय" फिल्मों में भी दो तरह की "क्षेत्रीय" फिल्में आती हैं। एक "उत्तर भारतीय" ("राज ठाकरे" साहब.... मैंने आपका कोई "कॉपी राईट" तो भंग नहीं किया? यह शब्द कहने का हक़ सबसे ज्यादा आपको हीं है, लेकिन "एकमात्र" आपको नहीं) और दूसरा "दक्षिण भारतीय"। "दक्षिण भारतीय" फिल्मों के बारे में हमारे "दक्षिण भारतीय़" दोस्त एक-राय होते हैं और वे खुले-दिल से इन फिल्मों को स्वीकार करते हैं लेकिन हम "उत्तर भारतीय" उन फिल्मों को खिल्ली में उड़ा देते हैं। मेरे हिसाब से यह गलत है और यह नहीं होना चाहिए, लेकिन इससे भी ज्यादा गलत है "उत्तर भारतीय" फिल्मों का पूरे हिन्दुस्तान के लोगों द्वारा मजाक उड़ाया जाना। पहले दक्षिण भारतीय फिल्मों (तमिल, तेलगु, मलयालम, कन्नड़) की बात करते हैं.... मैं मानता हूँ कि इन भाषाओं में बनी कई सारी फिल्में हिंसा के इर्द-गिर्द बुनी होती हैं और कुछ दृश्य कल्पनातीत होते हैं, लेकिन ऐसा क्या इन्हीं फिल्मों में होता है... "हिन्दी" या फिर "अंग्रेजी" फिल्मों में नहीं। अगर सही से देखा जाए तो कौन-सा दृश्य कैसे फिल्माया जाना है, इस मामले में "दक्षिण भारतीय" फिल्में "हिदी" फिल्मों से कई कोस आगे हैं । "हिंदी" फिल्मों में जो आज दिखाया जा रहा है या जो प्रयोग आज किये जा रहे हैं, वैसे प्रयोग तमिल या तेलगु फिल्मों में दसियों साल पहले किए जा चुके हैं। "मार-धाड़" में अतिशय करने की प्रवृत्ति "अंग्रेजी" फिल्मों में भी तो खुलेआम नज़र आती है (मसलन : डाई हार्ड), लेकिन वहाँ तो कोई आश्चर्य नहीं जताता, फिर यहाँ क्यों? मैं इस बात को सराहता हूँ और सच कहिए तो बेहद पसंद करता हूँ कि "तमिल" या "तेलगु" जनता अपने फिल्मों से काफी हद तक जुड़ी रहती है, बस हम "उत्तर भारतीयों" को इन फिल्मों के बारे में अपना नजरिया बदलना है।

अब बात करते हैं अपने "उत्तर भारतीय" फिल्मों की। चूँकि मैं सोनपुर से हूँ जो "छपरा" जिला में आता है, तो इस लिहाज से "भोजपुरी" फिल्मों से इत्तेफ़ाक न रखना असंभव-सा है। मैं आजकल की "भोजपुरी" फिल्मों का उतना बड़ा प्रशंसक नहीं, जितन पिछले दशक की फिल्मों का हूँ, लेकिन हाँ....... मैं इन फिल्मों से (आज-कल की फिल्मों से) नफ़रत नहीं करता। मैं मानता हूँ कि इन फिल्मों का स्तर नीचे गया है, लेकिन इतना भी नीचे नहीं गया कि इनकी बात करना भी "पाप" हो। लोगों ने इन फिल्मों का ऐसा हव्वा बनाया हुआ है कि अगर कोई कहीं "भोजपुरी" बोलता भी दिख जाए तो उससे कोई अश्लील भोजपुरी गाना गाने को कहेंगे (हाँ कुछ अश्लील गाने बने जरूर हैं, लेकिन ऐसे गाने हर भाषा में बनते हैं) या फिर उससे कन्नी काटकर निकल जाएँगे। शायद इसीलिए हमारी यूपी-बिहार की भोजपुरी जनता अपने-आप को शहरी दिखाने के लिए "भोजपुरी" न जानने या फिर "भोजपुरी फिल्में" न देखने का स्वांग रचती हैं, ताकि लोग उन्हें "दूसरी / निकृष्ट" बिरादरी का न समझें। "भोजपुरी" की आज जो हालत है, उसमें इन "भोजपुर के नालायक संतानों" का सबसे बड़ा हाथ है। अगर बाहर के लोग हमें नीचा समझते हैं या नीचा दिखाते हैं तो हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम उन्हें "सच्चाई" से अवगत कराकर "सही" रास्ते पर ले आएँ, उन्हें "भोजपुरी" की विशाल संस्कृति के दर्शन करवाएँ। लेकिन तब क्या किया जाए , जब अपने हीं बीच के लोग अपनी माँ (भोजपुरी) को गाली देने लगें या फिर पहचानने से इनकार कर दें, तब तो हम असहाय हीं हो जाएँगे ना और तब दूसरों को हमारी अवहेलना करने से कौन रोकेगा? हममें से जितनों को भी यह लगता है कि "भोजपुरी" अब "पवित्र" नहीं रही (शायद यही सोचकर "घर" के लोग इससे दूर भागते हैं और "बाहर" के लोग इसके मज़े लते हैं) उनसे यह पूछा जाए (हाँ, मुझसे भी यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए) कि इस हालत का जिम्मेदार कौन है?

मेरे हिसाब से तो "भोजपुरी" जैसी मीठी और "दिल को छूने वाली" जबान कोई और नहीं (उर्दू इसके आस-पास आती है) । "पारिवारिक फिल्मों" के मामले में इस भाषा का कोई सानी नहीं। मैं आज एक पुरानी फिल्म "माई" देख रहा था। इस फिल्म के एक दृश्य में जब लड़की की शादी होती है तो "शारदा सिन्हा" ("पद्म-श्री" से सम्मानित भोजपुरी की प्रख्यात लोक-गायिका) ब्याह के गीत गाती हैं (हमारे यहाँ ऐसे गीतों से हीं शादी में रौनक आती है)। मैं झूठ नहीं बोल रहा - इस गीत को सुनकर और इस दृश्य का मनन करके मुझे पिछले नवंबर में हुई अपनी बहन की शादी याद आ गई और बरबस हीं आँखों से आँसू आ गए। ऐसा इससे पहले मेरे साथ कभी नहीं हुआ था। तो आप हीं कहिए कि जो फिल्म, जो दृश्य, जो भाषा आपके अंतस को छू जाए वो "अश्लील" या "मज़ाक का पात्र" कैसे हो सकती है? यह बस कुछ लोगों के मन का भ्रम है या फिर कुछ लोगों की अधूरी जानकारी , जिसने इस भाषा की "मधुरता" को अर्श से उठाकर "फर्श" पे डाल दिया है। यही बात मैं "बांग्ला भाषा" और "बांग्ला फिल्मों" के बारे में भी कहना चाहूँगा। न जाने क्यों ज्यादातर लोगों को "बांग्ला भाषा" की बुराई करने से क्या हासिल होता है। ये लोग "बांग्ला फिल्मों" का "क ख ग घ" भी नहीं जानते, लेकिन "फिल्मों" की दुर्गति करने में रैन-दिवस लगे रहते हैं। और यहाँ भी इस दुर्गति में सबसे बड़ा हाथ हमारे कुछ "बंगाली बंधुओं" का हीं हैं। मैंने कई सारी "बांग्ला" फिल्में देखी है (हाल-फिलहाल में "अंतहीन") और मुझे लगता है कि संबंधों को दर्शाने में "बांग्ला" फिल्मों के सामने दूसरी भाषा की फिल्में कहीं नहीं ठहरतीं।

कुल मिलाकर.... मैं बस यही कहना चाहता हूँ कि आप किसी भी भाषा या किसी भी भाषा की फिल्म को अपने "पूर्वाग्रह" या फिर "दुराग्रह" के कारण न नकारें। "नकारने" की इस मनोवृत्ति को आप चाहें जो भी कहें, लेकिन मैं इसे "दोहरी मानसिकता" हीं कहूँगा।

बाकी बातें... अगली मुलाकात में! तब तक के लिए खुदा हाफ़िज़!!


शनिवार, 26 जून 2010

आसन, भाषण और अब शासन के गुरू - बाबा रामदेव


हमारी एक बड़ी बहन सरीखी मित्र जो एक अच्छी गाइनकोलॉजिस्ट भी हैं, यह बात सत्य है जहां वे अपना चिकित्सालय चलाती है, अधिकतकर बच्चों ने उन्ही के शुभ हाथो से जन्म लिया। उनके अच्छे स्वभाव के कारण युवा से लेकर बुजुर्ग तक बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक भी हैं सो उन्होने चुनाव लड़ने का मन बना लिया। एक बड़े राजनैतिक दल ने उनको टिकट भी दे दिया। उन्हे लग रहा था जिले के बड़ी संख्या में उपलब्ध प्रशंसक उनके पक्ष में मतदान कर उन्हे विजय श्री दिलवा देगें। परन्तु ऐसा नही हुआ, चुनाव में उन्हे निराशा हाथ लरगी। पिछले लोकसभा चुनाव में आन्ध्र प्रदेश के सिने सुपर स्टर चिरंजीवी को भी कुछ ऐसा ही भ्रम हो गया उन्होने भी पूरे प्रदेश में अपने प्रत्याशी लड़ाये। प्रचार के समय उनकी सभाओं में अप्रत्याशित भीड़ भी उमड़ती थी मानो उक्त प्रदेश की सभी सीटें वे ही जीत रहे हों। विपक्षी दल भी सकते में आ गये। उन्हे भी भ्रम हो गया कि आन्ध्र की राजनीति में चिरंजीवी का एकछत्र राज्य होने वाला है। पर ऐसा नहीं हुआ। सिनेमा प्रेमियों ने भीड़ द्वारा उनका उत्साह तो बढ़़ाया पर वोट नहीं दिये। जनता ने इन्हे भी राजनीति के क्षेत्र में ससम्मान नकार दिया। इसी प्रकार का भ्रम जय गुरू देव को भी हो गया था। प्राप्त परिणाम से उन्हे लगभग ढाई दशक गुमनामी के अंधेरे में रहना पड़ा जब तक उस समय की पीढ़ी विषय को पूरी तरह भूल नहीं गयी। इसी प्रकार न जाने कितने विभिन्न क्षेत्रों में अत्यधिक सम्मान प्राप्त व्यक्तियों ने अपनी लोकप्रियता को मतपेटी तक पहुंचाने का प्रयास किया परन्तु वे असफल ही रहे। व्यक्तिगत स्तर पर तो विभिन्न चुनावों में लड़ने वालो की बाढ़ सी आ जाती है। लगभग हर सीट पर कोई न कोई गैर राजनैतिक व्यक्ति अपना भाग्य आजमाता है। हार या जीत जाने पर पलटकर क्षेत्र का मुंह नहीं देखता। मेगा सुपर स्टार अमिताभ बच्चन से अच्छा उदाहरण और नहीं हो सकता।
वर्तमान में योग गुरू रामदेव जी को भी कुछ उपरोक्त नामी-गिरामी हस्तियों की तरह भ्रम उत्पन्न हो गया। उन्हे लग रहा है वे अपनी लोकप्रियता को राजनैतिक क्षेत्र में भुना सकते है। परन्तु उन्हे यह जानना चाहिए समाज आप के साथ किस विषय पर खड़ा है। स्वामी जी को यह बात भली भॉति समझकर कदम उठाना चाहिए कि जनता किसे प्यार देती है किसे सम्मान और वह किसे नोट देती है और किसे वोट। रामदेवा जी को जानना चाहिए जनता उनके साथ कपाल-भाति मे तो है पर राजनीति में साथ दे ऐसा बिल्कुल भी आवश्यक नहीं।
रामदेव कब स्वामी से लेकर योग गुरू बन गये उनके शब्द, शिक्षा, प्रवचन-भाषणों में परिवर्तित होते चले गये पता हीं नहीं चला। देखते ही देखते हरिद्वार की सड़कों पर साइकिल से चलने वाला एक साधारण व्यक्ति किस प्रकार लगभग 10 वर्षों में करीब सत्तर हजार करोड़ रूपये का स्वामी बन गया। आज स्वामी जी के पास विदेशों में भी अकूत अचल सम्पत्ति है। यह बात सत्य है भारत से विलुप्त हो चुके योग विज्ञान को उन्होने पुनः सार्वजनिक किया। इस विषय पर उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाय कम होगी। परन्तु उसकी आड़ में धन का जो खेल चला वह उनके उक्त सम्मान का कम करता है। योग की कक्षा लगा सिनेमा की तरह श्रेणीगत टिकटों की बिक्री उनकी उक्त लोकप्रियता पर प्रश्न चिन्ह लगाती है। उनकी यौगिक क्रियाओं की सी0डी0 तथा साहित्य की ऊॅची कीमतों पर बिक्री भी उनके योग व्यवसायीकरण की तरफ इंगित करती है। आज वे नमक, शरबत टूथब्रश तथा अचार सहित विभिन्न छोटी-छोटी दैनिक उपयोग की वस्तुओं की भी बिक्री करने लगे। सुना जा रहा है जल्द ही वे मिनरल वाटर बनाने का भी संयत्र लगाने जा रहे है।
स्वामी जी के योग आसन तथा प्राणायाम के ज्ञान को जनता ने सिर ऑखों पर बैठाया। उनके प्रवचन से लेकर दन्त मंजन तक समाज ने स्वीकार किये। परन्तु राजनीति में भाग्य आजमाने का फैसला उनके लिए निश्चित ही मुश्किले खड़ी करेगी। वे किस प्रकार रजनीति में शुचिता की बात करेंगे। क्या जनता उनसे यह नहीं पूछेगी उनका इतना बड़़ा आर्थिक ताना-बाना किस सामाजिक शुचिता की उपलब्धि है।
स्वामी जी जिस प्रकार बीमारों का इलाज करते-करते भगवा वस्त्रों की आड़ ले राजनैतिक जनसमर्थन प्राप्त करने का प्रयास एवं प्रधानमंत्री पद की लिप्सा पाले अपने जनकल्याण के स्वरूप का व्यापारीकरण एवं अब राजनीतिकरण किया है। समाज सब देख रहा है। जिस तरह बाबा ने वर्ष 2014 में होने वाले आम लोकसभा चुनाव में सभी 542 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े करने की घोषणा की है। इस प्रकार की घोषणा किसी भी एक व्यक्ति ने पूर्व में भारत के इतिहास में नहीं की। उनकी व्यवस्थित राजनैतिक तैयारियों को देखते हुए ऐसा लगता है उनके पीछे कई बड़े समूह है जो देशी भी हो सकते है तथा विदेशी भी। बाबा की योग कक्षाओ, आयुर्वेदिक दवाओं, दिनचर्या की साधारण वस्तुओं से लेकर योग साहित्य तक की व्यवस्थित मार्केटिंग उक्त शक को और पुख्ता करती है। उक्त व्यवस्था में बाबा के विश्वस्त साथी बालकिशन महाराज जी का नाम आता है। परन्तु मार्केटिंग ऐसे कठिन विषय को महज एक व्यक्ति संचालित कर रहा है, जो समझ से परे है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय राजनीति में जहॉ काग्रेस पार्टी स्वाधीनता के रथ पर सवार होकर आयी वहीं जनसंघ (वर्तमान भाजपा) ने प्रखर राष्ट्रवाद तथा हिन्दुत्व के साथ राजनीति का दामन पकड़। जय प्रकार प्रकाश नारायण जी ने युवाओं के साथ अपनी राजनैतिक पारी खेली वही कम्युनिस्ट मजदूरों के सहारे राजनैतिक अखाड़े में अपनी उपस्थिति बनाये है। बात एकदम स्पष्ट है हर दल के साथ एक न एक महत्वपूर्ण समाज जुडा है या था। जो उनके आधार मत की तरह हमेशा उनके साथ खड़ा रहा। हर राष्ट्रीय दल का अपना एक गौरवशाली इतिहास है न कि स्वामी रामदेव जी की तरह आसन, भाषण, तथा अन्त में शासन की अभिलाषा वाली सिर्फ बेचैनी।
बाबा रामदेव अपनी योजना भर पूरा प्रयास कर रहे है कि उनकी राजनैतिक पारी की शुरूआत दमदार तरीके से हो। उनसे कोई छोटी सी चूक भी न हो जिसका परिणाम उन्हे भुगतना पड़े। इसीलिए देश में 18 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं पर उन्होने प्रथम डोरे डालने प्रारम्भ किये। मुस्लिम उलमाओं से सम्पर्क उनकी मुस्लिम घेरे बन्दी का प्रथम चरण था। वैश्विक स्तर पर अपनी कट्टर छवि के लिए मशहूर देवबंद मदरसे में उनका जाना, अपने उद्बोधन का प्रारम्भ कुरान शरीफ की आयातों से करना उनकी राजनैतिक योजना का हिस्सा थी।
इसी वर्ष उनकी एक देशव्यापी आन्दोलन की तैयारी भी है। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट जिसकी राजनैतिक इकाई अगला लोकसभा चुनाव लडे़गी। मजे की बात है केसरिया वस्त्र धारण किये स्वामी रामदेव ने अपनी राजनैतिक पार्टी का ध्वज वाहक हिन्दु धर्म को नहीं बनाया है। उन्हे भय है हिन्दू धर्म का विषय आते ही मुस्लिम मतदाता भड़क न जाये।
भारतीय संस्कृति में गुरू के स्थान को ईश्वर से भी उच्च आसन प्रदान किया गया है। वैश्विक योग गुरू के रूप में स्थापित रामदेव जी महाराज स्वयं को गुरू कहलाने में गौरवान्वित महसूस करते है। परन्तु स्वयं उनके गुरू शंकर देव जी कहां हैं। कभी उनके मुंह से अनायास भी नहीं निकलता इस भय से कि कहीं उनकी लोकप्रियता मे वे हिस्सेदार न हो जाये।
एक पुरानी कहावत है तेज दौड़ने वाला व्यक्ति उतनी ही तेजी से गिरता है। ऐसा लगता है मानेा स्वामी जी के साथ भी ऐसा ही कुछ घटित होने वाला है। वास्तव में रामदेव जी की माया का इन्द्रजाल समाप्त होने के कगार पर है। जिसका अन्तिम चरण उनके मन में भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहा है। रामदेव जी से पहले भी बडे़-बडे़ स्वामी हुए। ओशो रजनीश जिनके पास धन-धर्म तथा समाज का एक बड़ा वर्ग था। उन्होने तो स्वयं को भगवान तक कहला लिया था। महेश योगी जिनका मुख्यालय हालैण्ड में था उनके शिष्यों में रामनाथ गोयनका से लेकर सत्ता के ऊॅचे-ऊॅचे लोग थे। परन्तु इस प्रकार का स्वप्न इन्होने भी नहीं देखा। कर्ण के द्वारा कुण्डल कवच का दान हो या रावण द्वारा सीता माता का छला जाना। भारतीय समाज हमेशा धर्म की ओट में ही ठगा गया है। बाबा राम देव जी ने संत वेश का उपयोग व्यापार में किया जिसे अब राजनीति मे करना चाहते है। जो निन्दनीय है। देश की जनता की परख बहुत तीखी होती है। वह समय आने पर अपना काम अवश्य करती है। आने वाला समय स्वामी जी के दिवास्वप्न को धूलधूसरित करेगा। उनके सफल योग गुरू से सफल व्यापारी उसके बाद उनकी प्रधान मंत्री पद की लालसा उन्हे लोकप्रियता के अन्तिम पड़ाव पर पहुंचा रही है।